नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपाल की बिल मंजूरी की डेडलाइन तय करने वाली याचिकाओं पर फैसला आना शुरू हो गया है। कोर्ट ने कहा कि अगर गवर्नर को आर्टिकल-200 के तहत सही प्रोसेस का पालन किए बिना असेंबली से पास बिल रोकने की इजाजत दी जाती है, तो यह फेडरलिज्म के हित के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि हमें नहीं लगता कि गवर्नरों के पास स्टेट असेंबली से पास बिलों पर रोक लगाने की पूरी पावर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गवर्नर्स के पास तीन ऑप्शन हैं- या तो मंजूरी दें या बिलों को दोबारा विचार के लिए भेजें या उन्हें प्रेसिडेंट के पास भेजें। राज्यपाल विधेयक को कानून बनाने के बीच सिर्फ एक रबर स्टैंप नहीं हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
कोर्ट रूम LIVE, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बातें
- हमने यह माना है कि राज्यपाल के पास विधेयकों को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए इस प्रकार प्रदत्त विवेकाधिकार उन्हें विधेयकों को हमेशा के लिए रोके रखने की अनुमति नहीं दे सकता।
- उनके पास तीन स्पष्ट विकल्प हैं: या तो स्वीकृति प्रदान करें, स्वीकृति रोक लें और टिप्पणी के साथ विधानमंडल को लौटा दें, या इसे राष्ट्रपति के पास भेज दें। इन तीनों विकल्पों में से किसी एक को चुनने का विवेकाधिकार उनके पास है।
- हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपालों के लिए समयसीमा तय करना संविधान द्वारा दी गई छूट के खिलाफ है।
- राज्यपाल अनिश्चित काल तक बिलों को अपने पास लेकर नहीं बैठ सकते, लेकिन समय सीमा तय करना शक्तियों के बंटवारे को कुचलना होगा।

