चंडीगढ़: सत्संग में भी सभी महात्मा एक ही बात पर जोर दे रहे थे कि आत्मा अविनाशी परमपिता परमात्मा की अंश है और हम इस अविनाशी परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं। जिस तरह मीराबाई जी का भी जिक्र हो रहा था कि बचपन से वो अपने हाथ में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति रखती ही थीं, पर जब गुरु रविदास जी का सत्गुरु रूप में उनके जीवन में आना हुआ, उसके बाद उनकी अवस्था बदल गई। फिर वो कह उठीं कि ‘राम रतन धन पायो’ इससे यही पता लगता है कि मीरा जी को भी इस अविनाशी की जानकारी ब्रह्मज्ञान द्वारा ही हुई तभी उन्होंने इस रमे – राम को पाया।

हमारा समय भी बीतता चला जा रहा है और जितना बीत गया वो तो निकल गया, पर जो बचा हुआ है उसके एक-एक पल का हमने सदुपयोग करना है । अगर कोई बुरी आदत या क्रोध आदि जैसे विकार अभी भी हैं, तो समय रहते उनको बदला जा सकता है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जब हम किसी धार्मिक स्थान पर जाते हैं तो हमारी body language (हाव-भाव ) और बोलचाल सुन्दर हो जाते हैं, पर संसार में विचरण करते हुए मीठे वचनों के स्थान पर मुख से रूखे बोल और अपशब्द निकलने लग जाते हैं। अगर हम यह अहसास कर लें कि प्रभु परमात्मा हमेशा हमारे साथ है, तो धीरे-धीरे हमारी भाषा में सुधार आ जाएगा और आदतें भी बदल जाएंगी।
जीवन में हमारे पास बहुत सारी choices (विकल्प) होते हैं कि हम क्या करना चाहते हैं, जैसे टीवी देखते हुए हम पर निर्भर करता है कि हम न्यूज देखना चाहते हैं, गाना सुनना चाहते हैं या सीरियल देखना चाहते हैं। इसी तरह रेडियो सुनते हुये भी अपने चुनाव से हम स्टेशन लगा सकते हैं। ऐसे ही भोजन करते समय भी चुनाव हमारे विवेक और बुद्धि पर निर्भर करता है। ईश्वर ने हमें जो चेतनता दी है, एक ब्रह्मज्ञानी उसका उपयोग करके सकारात्मक सोच रखता है और परोपकार की दृष्टि से जीवन जीता है; उस छायादार वृक्ष के समान जो खुद तो धूप में खड़ा होता है, पर जो भी उसके नीचे आ जाये उसको छाया ही देता है। ऐसे ही चंदन के पेड़ पर अगर साँप भी लिपट जाए तो भी वह अपनी खुशबू नहीं छोड़ता।

हम कबीर जी का भी उदाहरण सुनते हैं कि जब उनके पास एक जिज्ञासु आया और पूछने लगा कि हम प्रतिदिन सत्संग क्यों करते हैं तो कबीर जी उसके सामने एक कील पर हथौड़ा मार देते और कुछ बोलते नहीं थे। वो अगले दिन फिर आता और यही प्रश्न पूछता तो उसी कील पर एक और हथौड़ा मार देते। कुछ दिनों बाद उस जिज्ञासु को ये बात समझ में आ गई कि जिस तरह कील को जमीन में पक्का करने के लिए बार-बार हथौड़ा मारना जरूरी है उसी प्रकार अच्छे संस्कारों और अच्छी आदतों को जीवन में ढालने के लिए सत्संग भी नित्य करना ज़रूरी है। सत्संग से ये गुण हमारे sub-conscious mind (अवचेतन मन में बैठ जाते हैं। इसी प्रकार अगर क्रिकेट की मिसाल से जो एक गेंदबाज़, बल्लेबाज़ को तेज़ गेंद फेंकता है। अगर कोई बल्लेबाज से पूछे कि तुम रोज अभ्यास क्यों करते हो तो वो यही कहेगा कि गेंदबाज की गेंद अनेक angles (तरीके) से मेरे बल्ले पर आ सकती है। मेरे नित्य अभ्यास करने से मैं धीमी या तेज़ हर प्रकार की गेंद का सामना कर सकता हूँ। इसी प्रकार नित्य सत्संग करने से हम जीवन के उतार-चढ़ाव का सहजता से सामना कर पाते हैं।
एक भरी हुई बोरी में हम जहां भी छेद करेंगे, उसमें से वही बाहर आएगा जो उसमें भरा होगा, अगर चीनी होगी तो चीनी निकलेगी और अगर कुछ गंदी या कड़वी वस्तु भरी होगी तो वही बाहर निकलेगी। इसी प्रकार अगर हमारा नाता निरंकार से जुड़ा है तो हमारा व्यवहार और बोल भी सुन्दर बन जाएंगे। फिर कोई भी परिस्थिति हमें डुलायमान नहीं करेगी, हमारी मनोस्थिति एक सी बनी रहेगी।

